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Jayadeva Goswami

हिंदी अनुवाद (जैसा है वैसा): श्री जयदेव गोस्वामी राजा श्री लक्ष्मण सेन के दरबार में प्रधान पंडित थे। उनके पिता का नाम भोजदेव और माता का नाम बामा देवी था। उनका प्राकट्य 11वीं शताब्दी में बीरभूम ज़िले के अंतर्गत केंदु-बिल्वग्राम में हुआ था। श्री जयदेव की पत्नी का नाम श्री पद्मावती था। जब वे राजा लक्ष्मण सेन के प्रधान पंडित के रूप में कार्यरत थे, तब वे गंगा के तट पर स्थित नवद्वीप में निवास करते थे। उनके साथ वहाँ तीन अन्य पंडित भी उपस्थित थे, जिनके नाम उन्होंने श्री गीत-गोविंद में उल्लेखित किए हैं—श्री उमापतिधर, आचार्य श्री गोवर्धन और कवि क्षमापति। ये सभी उनके घनिष्ठ मित्र थे। श्री चैतन्य महाप्रभु को विशेष रूप से गीत-गोविंद, कंदीदास, विद्यापति, रामानंद राय की रचनाएँ तथा बिल्वमंगल ठाकुर द्वारा रचित कृष्ण-कर्णामृत का श्रवण अत्यंत प्रिय था। श्री गीत-गोविंद श्री श्री राधा-गोविंद की अत्यंत अंतरंग लीलाओं से परिपूर्ण है और इसलिए यह उन लोगों के लिए है जिन्होंने पर्याप्त आध्यात्मिक पुण्य संचित किया है। “जो लोग श्री हरि की लीलाओं के स्मरण का आस्वादन करते हैं और उन दिव्य, पारलौकिक कथाओं को सुनने के ल...

Sri Jagdish Pandit Appearance

(नित्यानन्द-सखा) उनके पिता का नाम कमलाक्ष था और उनके पितामह भट्ट नारायण थे। उनका श्रीपाट नदिया ज़िले के यशोड़ा ग्राम में, चाकदाहा रेलवे स्टेशन के निकट स्थित है। जगदीश द्वारा प्रतिष्ठित भगवान जगन्नाथ और भगवान गौरांग के विग्रह आज भी उनके श्रीपाट में विराजमान हैं। वे अपने पूर्व अवतार में चन्द्रहंस थे (चैतन्य-चरितामृत 1.11.30; गौर-गणोद্দেশ-दीपिका 153; श्रीपाट-पर्यटन)। अधिक विवरण जगदीशचरित्र में प्राप्त होते हैं। “श्री जगदीश पण्डित जगत के उद्धारकर्ता हैं। वे कृष्ण-प्रेम के अमृत का वितरण उसी प्रकार करते हैं जैसे आकाश में घने श्यामल मेघ वर्षा करते हैं।” — (चैतन्य-चरितामृत, आदि 11.30) श्री जगदीश भट्ट का जन्म गैहाटी प्रदेश में हुआ। उनके पिता का नाम श्री कमलाक्ष भट्ट था, जो भट्ट नारायण के पुत्र थे और गोयघर बान्ध्याघाट के निवासी थे। जगदीश के माता-पिता दोनों ही अत्यन्त भक्त वैष्णव थे। माता-पिता के देहान्त के बाद वे अपनी पत्नी के साथ गंगा तट पर रहने आ गए। उनकी पत्नी का नाम दुखिनी-देवी था। (उनके छोटे भाई महेश भी उनके साथ गंगा तट पर आकर रहने लगे।) उन्होंने जगन्नाथ मिश्र के घर के पास अपना निवास बनाया।...

Skand 1 adhyay 11

Jai Srila Prabhupada 🙏 SB 1.11 इस पूरे प्रसंग का सार यह है कि भगवान श्रीकृष्ण का द्वारका में आगमन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि शुद्ध भक्ति के शाश्वत भावों का जीवंत प्रकाशन है। कुरुक्षेत्र युद्ध के कारण भगवान से लंबे वियोग में रहे द्वारकावासी, उनके शंखनाद को सुनते ही भय, शोक और उदासी से मुक्त हो गए, क्योंकि भगवान की ध्वनि स्वयं भगवान के समान ही अभिन्न और अभयदायिनी है। यह शंखनाद बाह्य रूप से नगर में प्रवेश की सूचना था, किंतु अंतरात्मा में यह भक्तों के हृदय को पुनः जीवन देने वाली दिव्य चेतना का संचार था। भगवान के अधरों के स्पर्श से शंख का लाल होना इस सत्य का संकेत है कि भगवान के संपर्क मात्र से जड़ पदार्थ भी आध्यात्मिक बन जाता है, और वही संपर्क जीव के हृदय को भी प्रेम और ज्ञान से रंग देता है। द्वारका के निवासी कोई साधारण जीव नहीं थे, बल्कि भगवान के नित्य पार्षद थे, जो वियोग में भी निरंतर स्मरण के द्वारा भगवान से जुड़े रहते हैं; ठीक वैसे ही जैसे वृंदावन की गोपियाँ कृष्ण के दूर होने पर भी उनसे कभी अलग नहीं होतीं। इस प्रसंग के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि कृष्ण वृंदावन, मथुरा, कु...

Skand 1 adhyay 10

Jai Srila Prabhupada 🙏  SB 1.10 इस पूरे वर्णन का मूल सार यह है कि महाराजा युधिष्ठिर का शासन किसी भोग-विलास या विजय के गर्व पर आधारित नहीं था, बल्कि कर्तव्य, शोक, करुणा और भगवान की आज्ञा पर आधारित था। उन्होंने युद्ध अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए किया। विजय के बाद वे कभी भी स्वयं को विजेता नहीं मानते थे, क्योंकि उनके हृदय में अपने ही कुल के विनाश का गहरा दुःख था। इसलिए उन्होंने राज्य का आनंद नहीं लिया, बल्कि उसे सेवा के रूप में स्वीकार किया। भगवान श्री कृष्ण का उद्देश्य युद्ध कराना नहीं था, बल्कि उस क्रोध और लोभ से उत्पन्न अवांछित शक्तियों को हटाना था, जो संसार को आत्म-विस्मृति में धकेल देती हैं। कुरुक्षेत्र का युद्ध उसी बाँस की आग के समान था, जो किसी बाहरी कारण से नहीं, बल्कि आंतरिक घर्षण से भड़कती है। भगवान ने इस अग्नि को शमन किया ताकि पृथ्वी पर फिर से धर्म के आधार पर शांति स्थापित हो सके। महाराजा युधिष्ठिर का शासन इसलिए आदर्श था क्योंकि वे स्वयं को राजा नहीं, बल्कि भगवान का प्रतिनिधि मानते थे। उनके निर्णय व्यक्तिगत विचारधारा या महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि भगवान ...

Skand 1 adhyay 9

Jai Srila Prabhupada 🙏 Sb 1.9 इस प्रसंग का सार यह है कि कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद महाराज युधिष्ठिर अपने ऊपर लगे नरसंहार के भार से व्याकुल होकर धर्म और कर्तव्य का सत्य जानने के लिए भीष्मदेव के पास जाते हैं। बाणों की शय्या पर लेटे हुए भीष्मदेव कोई साधारण योद्धा नहीं, बल्कि इच्छामृत्यु के अधिकारी, ब्रह्मर्षि और भरत वंश के महान स्तंभ हैं। भगवान श्रीकृष्ण की योजना के अनुसार पांडव अत्यंत राजसी वैभव के साथ वहाँ उपस्थित होते हैं, ताकि अंतिम क्षणों में भीष्मदेव का मन प्रसन्न और स्थिर रहे। स्वयं भगवान श्री कृष्ण, जो सबके आराध्य हैं, मानवीय मर्यादा का पालन करते हुए एक साधारण संबंधी की तरह भीष्मदेव को प्रणाम करते हैं, जिससे यह प्रकट होता है कि भगवान अपने भक्तों के प्रति कितने विनम्र और स्नेहशील हैं। भीष्मदेव के इस महाप्रयाण ने समस्त ऋषियों, ब्राह्मणों और राजाओं को आकर्षित किया, क्योंकि वे केवल एक योद्धा नहीं बल्कि धर्म, त्याग और भक्ति के जीवंत प्रतीक थे। इस दृश्य में धर्मराज युधिष्ठिर का पश्चाताप, भगवान की करुणा और भीष्मदेव की आध्यात्मिक ऊँचाई एक साथ प्रकट होती है, जो यह सिखाती है कि जीवन और मृत्य...

Skand 3 adhyay 9

All glories to Srila Prabhupada  इस पूरे वर्णन का सरल सार यह है कि भगवान को जानना न तो केवल बुद्धि से संभव है, न तपस्या के घमंड से, न ही विज्ञान या दर्शन के तर्कों से। भगवान स्वयं परम सत्य हैं, समस्त सृष्टि के मूल कारण हैं, और फिर भी भौतिक प्रकृति से सर्वथा अछूते रहते हैं। जीवों का दुर्भाग्य यही है कि वे माया के आकर्षण में फँसकर मूल कारण को भूल जाते हैं और अस्थायी, भौतिक वस्तुओं को ही सर्वोच्च मान लेते हैं। ब्रह्मा जी ने स्वयं अनुभव किया कि जब तक भगवान की अकारण कृपा नहीं मिलती, तब तक उनका वास्तविक स्वरूप समझ में नहीं आता। तपस्या का भी वास्तविक फल तभी मिलता है जब वह भगवान की भक्ति तक ले जाए। भगवान की सुंदरता, ऐश्वर्य और आनंद इतने पूर्ण हैं कि जो एक बार उसे सही रूप में देख लेता है, वह फिर संसार के कूड़े-कचरे जैसे सुखों में आकर्षित नहीं होता। जैसे कौवे गंदगी में सुख ढूँढते हैं और हंस निर्मल सरोवर में, वैसे ही भौतिक आसक्ति वाले लोग संसार में रमे रहते हैं और भक्त भगवान के चरणों में। भगवान के साकार दिव्य रूप सभी के कल्याण के लिए हैं और वही भक्ति का आश्रय हैं; निराकार ब्रह्म उनका ही आंशिक...

skand 3 adhyay 8

All glories to Srila Prabhupada  इस पूरे प्रसंग का सरल सार यही है कि मनुष्य का वास्तविक कल्याण केवल भगवान और उनके शुद्ध भक्तों की संगति से होता है। पूरु वंश की महिमा इसलिए है क्योंकि वहाँ के लोग भगवान के प्रति समर्पित थे, न कि केवल ज्ञान, ब्रह्म या आंशिक परमात्मा में उलझे हुए। विदुर उसी परंपरा के हैं, इसलिए उनके हृदय में स्वाभाविक रूप से भगवान की कथाओं के प्रति गहरी जिज्ञासा और प्रेम है। मैत्रेय मुनि इस बात से प्रसन्न हैं कि ऐसे योग्य श्रोता के सामने वे श्रीमद्भागवत का उपदेश दे रहे हैं, क्योंकि भागवत केवल कथा नहीं बल्कि संसार में दुखी जीवों के लिए करुणा से दिया गया समाधान है। जीव थोड़े से सुख के लिए बड़े-बड़े कष्टों में फँस जाता है, शरीर को ही अपना स्वरूप मान लेता है और बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमता रहता है। लेकिन जब किसी सौभाग्यशाली व्यक्ति को भागवत ग्रंथ और भागवत भक्त दोनों की संगति मिल जाती है, तब उसका भ्रम टूटने लगता है और वह धीरे-धीरे बंधन से मुक्त हो जाता है। गंगा का उदाहरण यह सिखाता है कि केवल पवित्र स्थान या शुद्ध साधन का स्पर्श ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके बाद जीवन...