skand 9 adhyay 11
SB 9.11 यह अध्याय भगवान रामचंद्र के आदर्श शासन के एक और गहरे पक्ष को दिखाता है—उनकी दानशीलता, धर्मनिष्ठा, विनम्रता और प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व। अयोध्या में राज्य करते हुए उन्होंने अनेक भव्य यज्ञ किए, पर उनका उद्देश्य व्यक्तिगत वैभव नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना और भगवान की उपासना था। क्योंकि वे स्वयं परमेश्वर हैं, इसलिए उनका यज्ञ करना वास्तव में परम सत्य की ही उपासना थी—अर्थात भगवान की पूजा करने से समस्त देवताओं की पूजा अपने-आप हो जाती है। यज्ञों के अंत में भगवान राम ने अत्यंत आश्चर्यजनक उदारता दिखाई—उन्होंने चारों दिशाओं की भूमि विभिन्न पुरोहितों को दान कर दी और बीच की भूमि आचार्य को सौंप दी। इतना ही नहीं, उन्होंने लगभग पूरा राज्य ही ब्राह्मणों को दे दिया और अपने पास केवल व्यक्तिगत वस्त्र और आभूषण रखे, जबकि माता सीता के पास भी केवल एक आभूषण शेष रहा। यह बताता है कि सच्चा शासक संपत्ति का स्वामी नहीं, बल्कि समाज का संरक्षक होता है। परन्तु ब्राह्मण भी उतने ही आदर्श थे—उन्होंने समझा कि उनका कर्तव्य शासन करना या संपत्ति जमा करना नहीं, बल्कि ज्ञान और धर्म की रक्षा करना है। इसलिए उन्होंने भग...