Sri Srivas Thakur
“मैं अब इन शब्दों का संक्षेप में अर्थ बताता हूँ। इस पंच-तत्त्व में भक्ति-रूप (भक्त का स्वरूप) भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु हैं, जो पहले नंद महाराज के पुत्र श्री कृष्ण के रूप में प्रकट हुए थे। भक्ति-स्वरूप (भक्ति का विस्तार) भगवान नित्यानंद हैं, जो पहले व्रजभूमि में भगवान बलराम के रूप में प्रकट हुए थे। भक्ति-अवतार भगवान अद्वैत आचार्य हैं, जो सदाशिव से भिन्न नहीं हैं। भक्ता-आख्या (शुद्ध भक्त) श्रीनिवास और अन्य महान भक्त हैं। भक्ति-शक्ति श्री गदाधर पंडित हैं, जो ब्राह्मणों में श्रेष्ठ हैं।” (गौड़-गणोदेश-दीपिका 11) --- “भगवान चैतन्य, भगवान नित्यानंद अवधूत और भगवान अद्वैत—ये तीनों परम पुरुषोत्तम भगवान के अवतार हैं और सभी ‘प्रभु’ कहलाते हैं। इनमें भगवान चैतन्य, जो दया के सागर हैं, ‘महाप्रभु’ कहलाते हैं, और भगवान नित्यानंद तथा भगवान अद्वैत ‘प्रभु’ कहलाते हैं। ये तीनों ‘गोसाईं’ (इंद्रियों के स्वामी) भी कहलाते हैं। गदाधर को ‘द्विज’ (ब्राह्मण) और श्रीनिवास को ‘पंडित’ कहा जाता है। ये पंच-तत्त्व के सदस्यों की उपाधियाँ हैं।” (गौड़-गणोदेश-दीपिका 13) --- “हे मेरे प्रभु गौरहरि! आप मंगल के धाम हैं, जो कृ...