BG 4
चौथे अध्याय के प्रारंभिक श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि भगवद्गीता कोई नया सिद्धांत नहीं है, बल्कि अनादि काल से चला आ रहा दिव्य ज्ञान है। यह योग विज्ञान सबसे पहले सूर्यदेव विवस्वान को दिया गया, फिर मनु को, फिर इक्ष्वाकु को, और इस प्रकार राजर्षियों की परंपरा में आगे बढ़ता रहा। इससे स्पष्ट होता है कि यह ज्ञान केवल व्यक्तिगत मुक्ति के लिए नहीं, बल्कि समाज के संचालन, धर्म की रक्षा और मानवता के कल्याण के लिए भी है। जब शासक इस ज्ञान को समझते हैं, तब वे प्रजा को केवल आर्थिक नहीं, आध्यात्मिक उन्नति भी दे सकते हैं। भगवान बताते हैं कि समय के साथ यह परंपरा टूट गई और ज्ञान का वास्तविक स्वरूप लुप्त हो गया। जब शुद्ध संदेश गुरु-शिष्य परंपरा से न मिले, तब लोग अपने मन से अर्थ निकालने लगते हैं और सत्य धुंधला हो जाता है। इसलिए भगवान ने पुनः अर्जुन को यह ज्ञान दिया। इसका संदेश यह है कि आध्यात्मिक सत्य केवल बुद्धि-विलास या तर्क से नहीं समझा जा सकता; उसे प्रमाणिक परंपरा, श्रद्धा और शुद्ध हृदय से ग्रहण करना पड़ता है। भगवान अर्जुन को इसलिए चुनते हैं क्योंकि अर्जुन केवल शिष्य ही नहीं, भक्त और मित्र भी...