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Padmini Ekadashi Vrat Katha

श्री सूत गोस्वामी ने कहा, “युधिष्ठिर महाराज ने कहा: हे जनार्दन! अधिक मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है? उसका विधिपूर्वक पालन कैसे किया जाता है? कृपया यह सब मुझे बताइए।” भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, “हे पाण्डव! अधिक मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली पुण्यमयी एकादशी ‘पद्मिनी एकादशी’ कहलाती है। यह अत्यंत शुभ है। जो भाग्यशाली व्यक्ति दृढ़ निश्चय और श्रद्धा से इसका पालन करता है, वह मेरे निज धाम को प्राप्त करता है। यह अधिक मास की एकादशी पापों को नष्ट करने में मेरे समान ही शक्तिशाली है। स्वयं चार मुख वाले भगवान ब्रह्मा भी इसकी पर्याप्त महिमा नहीं कर सकते। बहुत समय पहले भगवान ब्रह्मा ने नारद को इस मोक्षदायिनी और पापनाशिनी एकादशी के विषय में बताया था।” कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर के प्रश्न से अत्यंत प्रसन्न हुए और उनसे मधुर वचन कहने लगे: “हे राजन्! अब ध्यानपूर्वक सुनो, मैं तुम्हें पद्मिनी एकादशी के व्रत की विधि बताता हूँ, जिसे बड़े-बड़े ऋषि भी विरले ही करते हैं। एकादशी से एक दिन पहले दशमी के दिन उड़द की दाल, चना, पालक, मधु और समुद्री नमक का सेवन नहीं करना चाहिए, न ही द...

SB 3.7

All Glories To Srila Prabhupada 🙏 SB 3.7 इन श्लोकों में विदुर जी एक बहुत गहरा प्रश्न पूछते हैं कि जब भगवान पूर्णतः दिव्य, शुद्ध और भौतिक गुणों से परे हैं, तो वे इस भौतिक संसार की सृष्टि, पालन और संहार जैसे कार्यों से कैसे जुड़े दिखाई देते हैं। इसका उत्तर यह दिया गया है कि भगवान स्वयं कभी भी माया या भौतिक गुणों के अधीन नहीं होते। वे अपनी शक्तियों के द्वारा सब कुछ करते हैं, लेकिन उन शक्तियों से प्रभावित नहीं होते। जैसे जादूगर अपनी जादुई कला दिखाता है पर स्वयं उससे प्रभावित नहीं होता, वैसे ही भगवान संसार की रचना करते हैं पर संसार के बंधन में नहीं आते। भगवान का स्वरूप पूरी तरह आध्यात्मिक है। जब वे इस संसार में प्रकट होते हैं, तब भी उनका शरीर और उनकी लीलाएँ दिव्य ही रहती हैं। कम बुद्धि वाले लोग सोचते हैं कि भगवान भी साधारण जीवों की तरह भौतिक प्रकृति से प्रभावित होते हैं, लेकिन यह गलत समझ है। जीवात्मा और भगवान में यही अंतर है कि जीव माया से भ्रमित हो सकता है, पर भगवान कभी नहीं। यह संसार उन जीवों के लिए बनाया गया है जिन्होंने भगवान की सेवा छोड़कर स्वयं भोगी और नियंत्रक बनने की इच्छा की। माया...

Skand 2 adhyay 6

All Glories To Srila Prabhupada 🙏 Sb 2.6 इन श्लोकों में भगवान के विराट स्वरूप का अत्यंत अद्भुत और गूढ़ वर्णन किया गया है। यहाँ यह समझाया गया है कि इस जगत में जो भी शक्तियाँ, तत्व, इंद्रियाँ, ध्वनियाँ, रूप, सुगंध, वनस्पतियाँ और प्राकृतिक व्यवस्थाएँ दिखाई देती हैं, वे सब भगवान के सार्वभौमिक शरीर से ही उत्पन्न होती हैं। भगवान का मुख वाणी का मूल स्रोत है, और अग्निदेव उस शक्ति के नियंत्रक हैं। वैदिक मंत्र, विशेषकर गायत्री मंत्र, भगवान की त्वचा और उसके आवरणों से प्रकट होते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि वेद कोई मानव-निर्मित ज्ञान नहीं हैं, बल्कि स्वयं भगवान की दिव्य शक्ति का प्राकट्य हैं। भगवान की जीभ से सभी प्रकार के भोजन और रस उत्पन्न होते हैं। देवताओं के यज्ञ, पितरों के अर्पण और सामान्य मनुष्यों के भोजन—all ultimately originate from Him. इसका गहरा अर्थ यह है कि इस संसार में जो भी आनंद या स्वाद अनुभव किया जाता है, उसका मूल आध्यात्मिक स्रोत भगवान ही हैं। भौतिक जगत में वही चीजें विकृत रूप में दिखाई देती हैं, जबकि आध्यात्मिक जगत में वे पूर्णतः शुद्ध और भगवान की प्रेममयी सेवा में लगी रहती हैं।...

Skand 2 adhyay 5

All Glories To Srila Prabhupada 🙏 इन श्लोकों में भौतिक सृष्टि की क्रमिक रचना और मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य को अत्यंत गहराई से समझाया गया है। पहले आकाश उत्पन्न होता है, जिसमें केवल ध्वनि का गुण होता है। आकाश से वायु प्रकट होती है, जिसमें ध्वनि और स्पर्श दोनों गुण आते हैं। वायु से अग्नि उत्पन्न होती है, जिसमें ध्वनि, स्पर्श और रूप के गुण होते हैं। अग्नि से जल प्रकट होता है, जिसमें स्वाद का गुण जुड़ता है। अंत में जल से पृथ्वी उत्पन्न होती है, जिसमें गंध सहित पाँचों गुण पूर्ण रूप से प्रकट हो जाते हैं। इस प्रकार पृथ्वी पर जीवन की पूर्ण विविधता दिखाई देती है—वृक्ष, पर्वत, नदियाँ, पशु, पक्षी और मनुष्य सब इसी क्रमिक विकास का परिणाम हैं। लेकिन इन सबका मूल कारण कोई जड़ पदार्थ नहीं, बल्कि स्वयं भगवान हैं। सभी तत्व एक-दूसरे के कारण और परिणाम प्रतीत होते हैं, परन्तु अंतिम कारण भगवान श्री कृष्ण ही हैं। इसलिए ब्रह्म-संहिता और भगवद्गीता में उन्हें “सर्व-कारण-कारणम्” अर्थात् सभी कारणों का कारण कहा गया है। भौतिक जगत में जो कुछ भी दिखाई देता है, वह उनकी शक्ति का विस्तार मात्र है। इन श्लोकों में शरीर...

Skand 2 adhyay 4

All Glories To Srila Prabhupada 🙏 SB 2.4 इन श्लोकों का सार यह है कि जीवन की वास्तविक सफलता भगवान श्री कृष्ण के प्रति प्रेम और स्मरण में है। महाराज परीक्षित को बचपन से ही भगवान के प्रति स्वाभाविक आकर्षण था, क्योंकि उन्हें भक्त परिवार का संस्कार और शुद्ध गुरु का संग दोनों मिला। इसी कारण जब उन्होंने शुकदेव गोस्वामी से भगवान की कथा सुनी, तो उनका मन पूरी तरह कृष्ण में स्थिर हो गया और वे संसार की सभी भौतिक आसक्तियों से मुक्त हो गए। भागवत समझाता है कि पत्नी, बच्चे, धन, राज्य, मित्र, वाहन और ऐश्वर्य जैसी चीजें मनुष्य को संसार से बाँधती हैं। सामान्य लोग इन्हीं को जीवन का लक्ष्य मानते हैं, लेकिन शुद्ध भक्त इन सबको भगवान की सेवा का साधन समझता है। जब भगवान के प्रति प्रेम जागता है, तब मनुष्य का मोह संसार से हटकर भगवान की ओर चला जाता है। यही वास्तविक वैराग्य है। यहाँ यह भी बताया गया है कि धर्म, अर्थ और काम — अर्थात् धार्मिक कर्म, धन और इंद्रिय सुख — जीवन की अंतिम सिद्धि नहीं हैं। ये सब अस्थायी हैं। सच्चा ज्ञानी वही है जो समझ ले कि भगवान की भक्ति ही जीवन का परम लक्ष्य है। इसलिए महान भक्त संसार के दि...

Skand 2 adhyay 3

All Glories To Srila Prabhupada 🙏 SB 2.3 इन श्लोकों का सार यह है कि मनुष्य जीवन बहुत दुर्लभ और अनमोल है, लेकिन अधिकांश लोग इसे केवल शरीर और संसार के सुखों में ही बर्बाद कर देते हैं। वे अपने वास्तविक स्वरूप, अर्थात् आत्मा, को नहीं जानते। मनुष्य स्वयं को शरीर मानकर धन, शक्ति, परिवार, प्रसिद्धि और इंद्रिय सुखों के पीछे भागता रहता है, जबकि यह सब अस्थायी है। इसलिए शुकदेव गोस्वामी बताते हैं कि वास्तव में बुद्धिमान वही है जो मृत्यु से पहले भगवान कृष्ण की शरण लेकर उनके नाम, गुण और लीलाओं का श्रवण और कीर्तन करे। संसार में लोग अलग-अलग भौतिक इच्छाओं के लिए अलग-अलग देवताओं की पूजा करते हैं—कोई धन चाहता है, कोई शक्ति, कोई सुंदरता, कोई संतान, कोई स्वर्ग। देवताओं की पूजा से कुछ समय के लिए भौतिक लाभ मिल सकते हैं, लेकिन जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग जैसी जीवन की असली समस्याएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। यही कारण है कि शास्त्र ऐसे लोगों को कम बुद्धि वाला कहते हैं, क्योंकि वे स्थायी समाधान छोड़कर अस्थायी सुखों के पीछे भागते हैं। शुकदेव गोस्वामी समझाते हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य भगवान के साथ अपने खोए हुए...

Skand 2 adhyay 2

All Glories To Srila Prabhupada 🙏 इन श्लोकों का सार यह है कि मनुष्य का वास्तविक उद्देश्य भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागना नहीं, बल्कि भगवान के साथ अपने खोए हुए संबंध को पुनः जागृत करना है। ब्रह्माजी जैसे महान जीव भी कभी-कभी अपनी वास्तविक स्थिति भूल जाते हैं, लेकिन भगवान के विराट रूप का ध्यान और उनकी भक्ति चेतना को पुनः जागृत कर देती है। जब मनुष्य भगवान को भूल जाता है, तब वह झूठे अहंकार और भौतिक इच्छाओं में उलझ जाता है; और जब वह भगवान का स्मरण करता है, तब उसका जीवन सही दिशा में चलने लगता है। शुकदेव गोस्वामी बताते हैं कि इस संसार में चाहे मनुष्य पृथ्वी पर रहे या स्वर्ग जैसे ऊँचे लोकों में जाए, हर जगह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग का दुख बना रहता है। इसलिए केवल बेहतर भौतिक सुखों की खोज करना अंततः व्यर्थ है। सच्चा सुख केवल भगवान के धाम और उनकी भक्ति में है। बुद्धिमान व्यक्ति इसलिए केवल जीवन की आवश्यक वस्तुओं को स्वीकार करता है और अपनी ऊर्जा आत्म-साक्षात्कार में लगाता है, क्योंकि भौतिक उपलब्धियाँ अंत में क्षणभंगुर सिद्ध होती हैं। मनुष्य को सरल जीवन और उच्च विचार अपनाने चाहिए। अधिक आराम, धन,...