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अध्याय 56 स्यामंतक रत्न की कहानी द्वारका-धाम के राज्य में सत्राजित नाम का एक राजा था। वह सूर्य देव का परम भक्त था, जिन्होंने उसे स्यमंतक नामक रत्न का वरदान दिया था। इस स्यमंतक रत्न के कारण राजा सत्राजित और यदु वंश के बीच मतभेद उत्पन्न हो गया। बाद में यह मामला तब सुलझा जब सत्राजित ने स्वेच्छा से कृष्ण को अपनी पुत्री सत्यभामा और स्यमंतक रत्न भेंट कर दिए। सत्यभामा ही नहीं, बल्कि जाम्बवान की पुत्री जाम्बवती का विवाह भी स्यमंतक रत्न के कारण कृष्ण से हुआ। ये दोनों विवाह प्रद्युम्न के प्रकट होने से पहले हुए थे, जिसका वर्णन अंतिम अध्याय में किया गया है। राजा सत्राजित ने यदु वंश को कैसे नाराज किया और बाद में कैसे उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने अपनी बेटी और स्यमंतक रत्न कृष्ण को अर्पित किए, इसका वर्णन इस प्रकार है। सूर्य देव के परम भक्त होने के कारण राजा सत्राजित का सूर्य देव से धीरे-धीरे घनिष्ठ संबंध हो गया। सूर्य देव उनसे प्रसन्न हुए और उन्हें स्यमंतक नामक एक विशेष रत्न भेंट किया। जब सत्राजित ने इस रत्न को गले में लॉकेट के रूप में धारण किया, तो वे बिल्कुल सूर्य देव के प्रतिरूप ...