Bhagavad Gita adhyay 6
Bg 6 अध्याय 6 के आरंभिक पाँच श्लोक यह समझाते हैं कि योग का वास्तविक अर्थ केवल जंगल में जाकर ध्यान करना, कर्म छोड़ देना या संन्यासी वस्त्र पहनना नहीं है। वास्तविक योग यह है कि मनुष्य अपने कर्तव्य करता रहे, लेकिन उनके फल को अपने भोग के लिए न चाहे। उसका उद्देश्य हो—मेरे कर्म से कृष्ण प्रसन्न हों। जब तक मनुष्य के भीतर यह भावना रहती है कि “मुझे इससे क्या मिलेगा, मुझे सुख कैसे मिलेगा?”, तब तक वास्तविक त्याग नहीं हुआ। सच्चा त्याग है—अपने सुख को केंद्र में रखने के बजाय कृष्ण के सुख को केंद्र में रखना। इस प्रकार कृष्णभावनामृत में रहने वाला व्यक्ति कर्म करते हुए भी योगी और संन्यासी हो सकता है। योग की उन्नति का अर्थ है कि धीरे-धीरे इंद्रिय-सुख की इच्छाएँ कम हों, संसार के आकर्षण कमजोर हों और मन भगवान की ओर अधिक लगे। केवल इच्छाओं को जबरदस्ती दबाना पर्याप्त नहीं; मन को कृष्ण के नाम, कथा, स्मरण और सेवा में लगाना आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा पाँचवें श्लोक में है—हमारा मन ही हमें ऊपर उठा सकता है और वही हमें नीचे भी गिरा सकता है। यदि मन संसार, भोग और इंद्रिय-विषयों का चिंतन करता रहेगा तो वही ब...